test_article

From Pravaha Wiki
Revision as of 06:07, 15 October 2026 by Bjsbot (talk | contribs) (BJS: convert (MAIN))
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search



Title test article
Author(s) Pravāha Editorial Team
Platform Bharatiya Jnana Sarita
Categories Society & Culture/Laukikaśāstra & Śaikṣaṇika
Year 2026
Type of Article Original Beginner
Difficulty Level Beginner
Summary
test_article

भूमिका-

प्राचीन भारतीय विचारक एक ऐसे धर्म राज्य के पक्ष में थे जहां धर्म पालन सामान्य हित के लिए आवश्यक था I राजा धर्म से ऊपर नहीं वरन धर्म के अधीन था I इसलिए कि धर्म का प्रबंध स्वेच्छाचारिता को रोकता है I कौटिल्य के अनुसार राजा का कर्तव्य की वह प्रजा को धर्म और काम से भ्रष्ट न होने दे अपनी प्रजा को धर्म और कर्म में पवित्र रखने वाला राजा लोक और परलोक में सुखी रहता है I एक अन्य स्थल पर कौटिल्य के ही अनुसार जब धर्म की उपेक्षा की जाती है और अधर्म के द्वारा उसे समाप्त कर दिया जाता है तो इसके परिणाम स्वरुप शासनकर्ता भी समाप्त हो जाता है I शुक्र द्वारा भी बताया गया है कि अधर्मी राजा को बलवान धर्मवान राजा द्वारा इस प्रकार दंड दिया जाना चाहिए I जिस प्रकार एक चोर को दंड दिया जाता है I शुक्र ने प्रजा को परामर्श दिया है कि वह अपने अधर्मी राजा को सुधारने या नष्ट करने के लिए धर्मशील तथा बलवान शत्रु का आश्रय ले I महाभारत के शांति पर्व में उल्लेख है कि राजा धर्म पालन के लिए हुआ है कामोपभोग के लिए नहीं I दंड की व्यवस्था भी धर्म अनुसार ही थी I

प्राचीन भारत में धर्म एक सर्वोच्च संस्था मानी जाती थी और संप्रभुता की मान्यता धर्म से पूर्णतया प्रभावित थी I राजा धर्म के विपरीत कुछ भी नहीं करता था I सरकार के तीन अंगों व्यवस्थापिका न्यायपालिका कार्यपालिका पर धर्म का पूरा प्रभाव था I धर्म अनुकूल आचरण करने पर ही संप्रभु को मान्यता प्रदान होती थी I धर्म कोई सांप्रदायिक धारण नहीं थी प्रजा का कर्तव्य भी धर्म अनुसार व्यवहार करना था I इतना होने पर भी प्राचीन भारतीय राज्य धार्मिक राज्य नहीं थे I यद्यपि राजा का व्यक्तिगत धर्म भी होता था किंतु लोक व्यवहार धर्मनिरपेक्ष होता था धार्मिक विश्वास व्यक्तिगत विषय था और प्रत्येक को मनचाहे धर्म का पालन करने की छूट थीI राजा द्वारा मान्य धर्म को यद्यपि राजश्रय प्राप्त होता था I लेकिन दूसरे धर्म के विकास में कोई बाधा नहीं डाली जाती थी I साररूप में धर्म की संप्रभुता पर धार्मिक राज्य नहीं का विचार मान्यता I हिन्दी विकिपीडिया विकिपीडिया का हिन्दी भाषा का संस्करण है, जिसे जुलाई 2003 में लॉन्च किया गया था। सितंबर 2026 तक इस पर 1,71,757 लेख हैं तथा यह 11वाँ सबसे गहरा विकिपीडिया संस्करण है।[1]

दिसंबर 2023 को, हिन्दी विकिपीडिया पर 9.1 करोड़ व्यूज़ मिले थे।[2]। 30 अगस्त 2011 के दिन यह एक लाख लेखों का आंकड़ा पार करने वाला पहला भारतीय भाषा विकिपीडिया बना।

लेखों की संख्या, सक्रिय सदस्यों, प्रयोक्ताओं की संख्या, सम्पादनों इत्यादि के आधार पर भारतीय भाषाओं में उपलब्ध विकिपीडिया का सबसे बड़ा संस्करण है और सभी संस्करणों में पचपनवाँ है। और इसे मुख्यतः हिन्दीभाषी लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाया गया था। चूँकि हिन्दी विकिपीडिया भारतीय लिपि (देवनागरी) का प्रयोग करता है इसलिए इसमें जटिल पाठ प्रतिपादन सहायक की आवश्यकता पड़ती है। विकिपीडिया पर ध्वन्यात्मक रोमन वर्णमाला परिवर्तक उपलब्ध है, इसलिए बिना किसी विशेष हिन्दी टाइपिंग सॉफ्टवेर डाउनलोड किये रोमन कुंजीपटल का उपयोग देवनागरी में टंकण करने के लिए किया जा सकता है। २०११ में ५७.१% भारतीय जनसंख्या हिन्दी जानती है,[13] जिसमें से ४३.६३% भारतीय लोगों ने हिन्दी को अपनी मूल भाषा या मातृभाषा घोषित किया था।[14][15][16] इसके अतिरिक्त भारत, पाकिस्तान और अन्य देशों में १४.१ करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली उर्दू, व्याकरण के आधार पर हिन्दी के समान है, एवं दोनों ही हिन्दुस्तानी भाषा की परस्पर सुबोध रूप हैं। एक विशाल संख्या में लोग हिन्दी और उर्दू दोनों को ही समझ सकते थे। भारत में हिन्दी, विभिन्न भारतीय राज्यों की १४ आधिकारिक भाषाओं और क्षेत्र की बोलियों का उपयोग करने वाले लगभग १ अरब लोगों में से अधिकांश की दूसरी भाषा है। हिन्दी भारत में संपर्क भाषा का कार्य करती है [13][17] और कुछ हद तक पूरे भारत में सामान्यतः एक सरल रूप में समझी जाने वाली भाषा है। कभी कभी 'हिन्दी' शब्द का प्रयोग नौ भारतीय प्रदेशों के संदर्भ में भी उपयोग किया जाता है, जिन की आधिकारिक भाषा हिन्दी है और हिन्दी भाषी बहुमत है, अर्थात् बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर (२०२० से) उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का।

धर्म की अवधारणा-

प्रत्येक देश का इतिहास बहुत कुछ उसके धार्मिक विचारों से प्रभावित होता हैI जनता ने नैतिक व्यवहार एवं धार्मिक शक्ति की पूर्ण अवहेलना करने वाले राज्य में भी धार्मिक विश्वास एवं रीति रिवाज वहां के सामाजिक तथा नैतिक कल्याण की धारणाओं में घुल मिल जाते हैं और जनमत तथा अनुकूल व्यवहार करने लगता है I अपने आप को धर्मनिरपेक्ष कहने वाला राज्य भी इन धार्मिक परंपराओं एवं रीति रिवाज को कानून द्वारा निर्मित करता है I उसके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को विश्वास की स्वतंत्रता प्रदान की जाती है तथा उसके धार्मिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं किया जाता १ I प्राचीन भारत में धर्म और राजनीति में गहरा संबंध था प्रत्येक राजा को रा ज्याभिषेक के समय ही यह प्रतिज्ञा करनी होती थी कि वह धर्म की स्थापना की रक्षा करेगा I भारत को धार्मिक सांस्कृतिक परंपराओं ने वस्तुतः धर्म को राजा से अधिक सम्मान प्रदान किया है I वह एक प्रकार से वह सभी राजाओं का राजा माना गया है २ I भारतीय जीवन के विभिन्न पहलू धर्म से इतने प्रभावित थे कि उनको अलग करके देखना असंभव था यहां राजनीति समाज अर्थव्यवस्था व्यवहार आदि विषयों के संबंध में जो भी विचार किया गया है I वह विचार धर्म से बहुत कुछ प्रभावित है धर्म शब्द का प्रयोग यहां कई अर्थों में किया जाता रहा है I इस शब्द की भी उत्पत्ति धृ धातु से हुई है जिसका अर्थ होता है धारण करना ३ I जो जीवन के कार्य व्यापारों का आधार है उसी को धर्म कहा जाता है I एक रहस्यपूर्ण अभिव्यक्ति धर्म है जो अनेक बातों पर संकेत करता है यI ह है राजनीतिक आर्थिक सामाजिक एवं धार्मिक धर्म की कोई अधिक संतोषजनक परिभाषा नहीं की जा सकती किंतु धर्मशास्त्रों ने ऐसे अनेक नियमों एवं उप नियमों के रचना की है जो उसकी समझ में धर्म शब्द का सही परिभाषा है ४ I धर्म के विभिन्न अर्थ हैं इसका अर्थ है सद्गुण सही कार्य प्रकृति का नियम औचित्य के प्रति अनुरूपता सर्वमान्य सत्य परंपराओं एवं रीति I रिवाज का नियम संग्रह औचित्यपन अन्तरात्मा अपरिवर्तनीय व्यवस्था कानून तथा इन सभी की विभिन्नताएं ५ I धर्म शब्द सामाजिक संबंधों के संबंध में भी प्रयुक्त किया जा सकता है I इसी प्रकार हम इसे व्यक्ति के धार्मिक कर्तव्यों के संदर्भ में भी प्रयुक्त करते हैं I धर्म शब्द का प्रयोग जीवन के किसी भी व्यवहार के संबंध में किया जाए इसका संबंध मौलिक रूप से नैतिक मानदण्डों से रहता है नैतिक मानदण्डों के आधार पर जांच करने के बाद ही इन क्षेत्रों में व्यक्ति के कार्यों को धार्मिक या अधार्मिक तय किया जाता है I वृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार धर्म की सहायता से एक निर्बल व्यक्ति भी शक्तिशाली पर शासन करने में समर्थ होता है I यह उपनिषद् धर्म को सत्य मानता है यदि कोई व्यक्ति सत्य की घोषणा कर रहा है तो वह धर्म घोषणा है और यदि वह धर्म की घोषणा कर रहा है तो यह सत्य की घोषणा है इस प्रकार सत्य एवं धर्म दोनों ही समानार्थक शब्द हैं ६ I

धर्म संबंधी वैदिक विचार-

वैदिक काल में धर्म का स्वरूप रित द्वारा व्यक्त किया जाता है I मूल रूप से धर्म को वेदों के परवर्ती काल की विशेषता माना जाता है I वेदों में तो प्रायः रितो का ही उल्लेख है रितों ने संसार के विनियमकारी पहलू पर अधिक जोर दिया है तथा उन सर्वोच्च कानून का वर्णन किया है I जिनके आधार पर संसार एवं देवता दोनों को प्रकाशित किया जाता है I इसमें प्रकृति के बदलते हुए रूपों का वर्णन है I साथ ही नैतिक व्यवस्था एवं मान्यताओं का भी वर्णन किया गया है I वेदों में धर्मन् शब्द का भी प्रयोग किया गया है जिसको प्रायः रित का समानार्थक माना गया है I

ब्राह्मण साहित्य में धर्म के विचार को अधिक महत्व दिया गया है I इस समय तक रित तथा धर्मन के पुराने विचार अपना महत्व को चुके थे I वेदों के धार्मिक उपचार का वर्णन करने के लिए ये ब्राह्मण ग्रंथ रचे गए I प्रत्येक वेद के अलग-अलग रूप से कई एक ब्राह्मण ग्रन्थों के रचना की गई I उपनिषदों में ब्राह्मण तथा आत्मा संबंधित ज्ञान की चर्चा की गई है I इन उपनिषदों ने सत्य को महत्वपूर्ण माना है जो व्यक्ति सत्य बोलता है उसी को ब्राह्मण कहते हैं I वैसे जाति यानी वर्ग या वर्ण आदि के भेद पर इनमें प्रकाश नहीं डाला गया है I यह उपनिषद् व्यक्ति को आशावादी बनाते हैं तथा उसके जीवन को आनंद का भंडार मानते हैं I उपनिषदों में सर्वत्र यही आदेश है की कमजोरी सुस्ती तथा हिम्मत का हारना I यह मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं संकीर्ण विचारों एवं छोटेपन को समाप्त करके बड़े विचार तथा बड़े संकल्प रखना चाहिए I सुख हमेशा बड़े में ही होता है अल्प में नहीं उपनिषदों में आत्मा की अमरता पर जोर दिया गया है I व्यक्ति जन्म और मरण के चक्र से केवल तभी छूट सकता है जबकि वह निश्चय एवं विश्वास के साथ ज्ञान तथा कर्म का समन्वय करके आचरण करें ऐसा करने से वह ब्रह्म से एकाकार हो जाता हैI

महाकाव्य में धर्म संबंधी विचार-

रामायण काल में आकर धर्म को अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई I उस समय सामान्य जनता पुराने लोकगीतों वार्ताओं एवं कहानियों के माध्यम से अपने विश्वासों का विकास करने की ओर उन्मुख हुई I यह धारणा मन में बैठ गई कि बाल्मीकि के राम धर्म के साक्षात अवतार माने जाते हैं I रामायण के धर्म संबंधी विचारों में अनेक बातें सम्मिलित हैं जैसे दूसरों के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करना I लोक जीवन की मर्यादाओं की रक्षा करना समाज की व्यवस्था को बनाए रखने में योगदान करना I मन तथा इंद्रियों को संयम में रखना आदि जहां धर्म बंधन ढीला पड़ जाता है वही समाज में विश्वखलता आ जाती है तथा व्यक्तिगत स्वार्थ को महत्व दिया जाने लगता है I विमाता के कहने पर राम ने जब राज्य पद त्याग दिया तो लोग उन पर भीरुता का आरोप लगाने लगे इन लोगों से राम का कहना था कि वह इतनी शक्ति रखते हैं कि चाहे तो अयोध्या ही क्या सारी पृथ्वी को वाणों से घेरकर स्वयं का राजतिलक कर सकते हैं किंतु यह अधर्म होगा धर्म के बंधन में रहने के कारण ही उन्होंने वनवास जाने का आदेश स्वीकार किया I राम को भगवान का अवतार मानने के पीछे सत्य यही है कि उन्होंने स्वयं धर्म का पालन किया सत्य के सेतु के सहारे संसार के हर संकट का मुकाबला किया तथा धर्म विरोधी तत्वों को समाप्त करके ऐसी परिस्थितियों पैदा की जिनमें प्रत्येक व्यक्ति धर्म का पालन कर सके I रामायण का धर्म संयत व्यवहार मर्यादापूर्ण आचरण और व्यवस्थित समाज व्यवस्था पर आधारित है I

कर्तव्य के रूप में धर्म-

महाभारत में व्यक्ति के स्वधर्म को पर्याप्त महत्वपूर्ण माना है I महाभारत एवं मनु के संबंध में गांगुली ने बताया है कि इसके विचारों का मूल निचोड़ कुछ एक सूत्रों में व्यवस्थित किया जा सकता है I प्रथम एक व्यक्ति का अपना कर्तव्य चाहे वह कितना ही कम महत्वपूर्ण क्यों न हो यदि पूर्ण रूप से संपन्न किया जाता है तो वह दूसरे के कर्तव्य से ऊंचा है यदि अपने कर्तव्य का पालन करने में मृत्यु का भी वरण करना पड़े तो ऐसा किया जाए दूसरे के कर्तव्यों को संपन्न करना खतरनाक है I दूसरे यदि एक व्यक्ति का कार्य चाहे कितना ही गर्हित एवं घृणित क्यों न हो उसे वह संपन्न करना चाहिए दूसरे के कार्यों को स्वयं हाथ में नहीं लेना चाहिए I अपने कर्तव्यों को संपन्न करने में समर्थ होते हुए भी यदि कोई व्यक्ति दूसरे के कार्यों को संभालता है तो वह संकट को बुलवा देता है I

कौटिल्य के अनुसार ऋग्वेद सामवेद तथा यजुर्वेद में वर्णित धर्म चारों वर्णों एवं चारों आश्रमों को अपने-अपने धर्म में स्थिर रखता है I अतः या संसार का परम उपकारक है अर्थशास्त्र में चारों वर्णों के धर्म का निरूपण करते हुए कहा गया है कि ब्राह्मण का धर्म अध्ययन अध्यापन यज्ञ याजन और दान देना तथा दान लेना है I क्षत्रिय का धर्म पढ़ना यज्ञ करना दान देना शस्त्र बल से जीविका उत्पादन करना और प्राणियों की रक्षा करना वैश्य का धर्म पढ़ने यज्ञ करना दान देना कृषि कार्य एवं पशुपालन और व्यापार करना है इसी प्रकार शुद्ध का अपना धर्म है कि वह ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य की सेवा करें खेती पशुपालन तथा व्यापार करें और शिल्प गायन वादन एवं चारण भाट आदि का कार्य करें I

निष्कर्ष-

महाभारत एवं मनु का धर्म संबंधी विचार एवं कौटिल्य द्वारा वर्णित व्यक्तिगत धर्म यह स्पष्ट करता है कि यहां धर्म का अर्थ कर्तव्य से लिया गया है I यदि वह व्यक्ति उस कार्य को संपन्न करता है तो धार्मिक है और यदि नहीं करता है तो अधार्मिक है I राजा का मुख्य धर्म यह माना गया है कि वह सभी व्यक्तियों को अपने-अपने धर्म में बनाए रखें I कोई व्यक्ति राजा का चाहे कितना ही निकट संबंध तथा घनिष्ठ मित्र हो यदि वह धर्म का पालन नहीं करता है तो उसे दंड दिया जाएगा धर्म के संबंध में छान्दोग्योपनिषद ने एक अन्य दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है I इसने धर्म को तीन भागों में बाटाँ है प्रथम में बलिदान अध्ययन और दान आता है द्वितीय में तपस्या तथा तृतीय में गुरु के यहां ब्रह्मचारी का निवास धर्म का अर्थ धारण करना है I जिस प्रकार धर्म संसार को धारण करता है उसी प्रकार धर्म को राजा धारण करता है I राजा द्वारा धर्म के विचार की रक्षा उस समय तक नहीं की जा सकती जब तक वह स्वयं भी उसका पालन न करें I यही कारण है कि सभी ग्रन्थों में राजा को धर्मानुकूल शासन संचालित करने की बात कही गई है तृतीय ब्राह्मण के अनुसार राजा को वही कहना तथा करना चाहिए I जो सत्य है कहीं-कहीं पर व्यवहार में इस कथन के अपवाद भी देखने को प्राप्त होते हैं किंतु सामान्य रूप से भारत में धर्म के नियंत्रण में राजा की सुरक्षाचारी शक्तियों पर अंकुश बनाए रखा है धर्म को राजा समाज जनता एवं सब कुछ के ऊपर बताया गया है I परंपरागत रूप से धर्म से संबंधित मूल रूप से दो विचार आते हैं एक वह तो इस अमूर्त प्रभावशाली शक्ति के संबंध में दार्शनिक सिद्धांत है और दूसरी ओर इन सिद्धांतों के अनुरूपता रखते हुए वह मूर्ति कानून है जो जीवन व्यवहार को संचालित करते हैं I इस प्रकार जो स्वाभाविक सार्वभौमिक व्यवस्था है वही व्यक्तियों के बीच व्यवस्था कायम कर सकती है I

बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार धर्म को चारों वर्गों की स्थापना के बाद बनाया गया ताकि वह इनमें स्थायित्व कायम कर सके I प्रारंभिक युग में जब मानवीय जीवन लालच चाह एवं भ्रम से ग्रस्त हो गया तो धर्म की प्रतिष्ठा समाप्त हो गई I धर्म के अस्तित्व को चुनौती दी जाने लगे ऐसी स्थिति में ब्रह्मा द्वारा एक लाख अध्यायों के एक ग्रंथ की रचना की गई I जिसमें जीवन के चार लक्षण धर्म अर्थ काम और मोक्ष का वर्णन किया गया I बाद में मनुष्यों के व्यवहार के लिए इसको संक्षिप्त रूप प्रदान किया गया I इस प्रकार दैविक कानून को मानवीकृत बना दिया गया यह माना गया की सार्वभौमिक धर्म की स्थापना तभी हो सकती है जबकि उनके अनुसार मानव व्यवहार की संचालित करने वाले कानून बना दिए जाएं I वैदिक काल में यह कानून वरुण द्वारा बनाए गए वरुण देवता का संबंध मुख्य रूप से नैतिकता एवं राजा के साथ था I वरुण ने ही राजाओं को कानून का स्वामी बना दिया तथा उसकी दंड से मुक्ति प्रदान की न्यायिक दृष्टि से यह दंड से मुक्त होते हुए भी वरुण तथा धर्म के अधीन थाI यह कहा गया कि जब राजा कोई गलती करें तो उसके दंड स्वरूप वह निर्धारित धन को पानी में डाल दे अथवा नियमित रूप से ब्राह्मणों को देता रहे I राजा द्वारा किए जाने वाला अनेक बलिदानों को भी उसकी गलतियों का शोधन मान लिया गया I

संदर्भ ग्रंथ

१-के ए एन शास्त्री द कांसेप्ट ऑफ़ सेकुलर स्टेट पेज 32

२-इस अर्थ में हम धर्म को संप्रभु कह सकते हैं

३- धारयति इति धर्मः

४- वी आर रामचंद्र दीक्षितर द गुप्ता पालिटी पेज 280-81

५-उपरोक्त

६-बृहाधारण उपनिषद 1-4-14

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

Published by.