Ithenticate Test
| Title | Ithenticate Test |
|---|---|
| Author(s) | Neeraja K |
| Platform | Bharatiya Jnana Sarita |
| Categories | Philosophy & Cognition/Ānvīkṣikī & Darśana |
| Year | 2026 |
| Type of Article | Original Beginner |
| Difficulty Level | Beginner |
| Summary |
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Test doc
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राम मन्दिर से रामराज्य के छोर तक
हमारी संस्कृति के लिये यह एक महत्वपूर्ण पल है, एक निर्वाह का दिन है जिसके लिये हमने सदियों तक प्रतीक्षा की है। शिशु राम लल्ला की अर्चा रूप में भगवान राम अपने जन्मस्थान में पुनः पदन्यास करने वाले हैं। इस दिन जब हमारे लाखों देशवासियों के प्रयास सफल हो रहे हैं, तो यह स्वाभाविक है कि हमारी छाती गर्व से फूल रही है और हमारे हृदय भक्ति से गदगद हो रहे हैं। क्या यह पोषित राम राज्य का पहला कदम हो सकता है? क्या प्रस्तुत समय और आने वाले समय में सनातन आर्य महर्षियों के भारत स्वर्णिम युग का पुनरागमन होगा? क्या यह संभव है? क्या ऐसी कल्पना संवैधानिक रूप से मान्य है? इस महत्वपूर्ण अवसर पर, हर्षोल्लास के साथ साथ इसके महत्व पर भी विचार करना उप्युक्त होगा। 'श्रीराम' शब्दमात्र से हमारे अन्तरङ्ग में विभिन्न भावनाएँ जागृत होति हैं । भक्तों के लिए वह परम है, परिपूर्ण अवतार है। दूसरों के लिए वह सत्य का प्रतीक है - वह वीर, जो प्रसन्न्ता पूर्वक अपने पिता की बात रखने के लिए सिंहासन से दूर जंगलों में चला गया। अनगिनत देशवासियों के लिए वह 'मर्यादा पुरुषोत्तम' है, जो सदाचार का प्रतीक है, जो धर्म को बनाए रखने के लिए नित्य समर्पित है । वह अतुलनीय और असहायशूर योद्धा थे
रामचंद्र जी को लोग भगवान मानते हैं। वेदों में राम का जिक्र नहीं है, उपनिषदों में से एक में स्वयं रामचंद्र जी के संवाद हैं तथा पुराणों में रामजी पर कई कथाएं हैं। राम दशरथ नंदन थे या दशावतार में से एक, यह धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भी भिन्न-भिन्न है। राम पौराणिक पुरुष रहें हो, चाहे ऐतिहासिक पुरुष रहे हों, पर निश्चित रूप से वह मर्यादा पुरुषोत्तम थे। रामायण के 300 से अधिक संस्करण भारत की विभिन्न भाषाओं से लेकर समूचे दक्षिण एशिया तथा जापान तक में प्रचलित हैं।
राम के लोकप्रिय बनने का सबसे बड़ा कारण उनके द्वारा रामराज्य की स्थापना रही। एक ऐसा राज्य जहां न कोई रोगी होता था, न कोई अनपढ़, न कोई ग़रीब होता, न शोषित। रामायण में रामराज्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि -
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज शरीरा।।
नहीं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब गुनग्य पंडित सब ज्ञानी। सब कृतग्य नहीं कपट सयानी।।
जिस आदर्श को कवि राम राज्य कहता है, उसमें तो असल में भरत राज्य, अर्थात नंदीग्राम का खड़ाऊं राज्य, अर्थात लोकस्वराज्य की चर्चा है, जिसमें सत्ता व्यक्ति या विशिष्ट व्यक्तियों के हाथ में न होकर सामान्य नागरिकों के हाथ में होती है। राम की अनुपस्थिति और राजा दशरथ की मृत्यु के बावजूद, 14 वर्षों तक अयोध्या में एक भी अप्रिय घटना नहीं घटी क्योंकि भरत ने स्वयं को केवल सुरक्षा एवं न्याय तक सीमित रखा, प्रशासन के चक्कर में नहीं पड़े।
वस्तुत: यदि हम विचार करें तो श्रीराम केवल एक महापुरुष या अवतार मात्र नहीं हैं। श्रीराम भारतीयों की आशा का एक केंद्र भी हैं। भारतीय जब भी निराश होते हैं, उन्हें श्रीराम से ही प्रेरणा मिलती है। इसलिए जब भी आवश्यकता पड़ी भारतीयों ने श्रीराम का ही नाम स्मरण किया। देश के स्वाधीनता संग्राम के दौरान भी भारतीयों की आशा का केंद्र केवल अंग्रेजों से मुक्ति नहीं थी, उनकी प्रेरणा रामराज्य प्राप्त करने की थी, जिसकी आशा महात्मा गाँधी जगा रहे थे। हालाँकि महात्मा गाँधी को रामराज्य की कितनी समझ थी, यह तो स्पष्ट नहीं है, परंतु भारत के जन-जन को रामराज्य की ठीक-ठीक समझ है और इसलिए रामराज्य को लाने के घोष करने पर वे महात्मा गाँधी के पीछे चल पड़े थे।
तो क्या हम राम मंदिर के निर्माण के प्रारंभ को रामराज्य की दिशा में बढ़ता एक कदम मान सकते हैं? इसका उत्तर हाँ भी है और नहीं भी। हाँ, इसलिए क्योंकि अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण से देश के सनातनी समाज में गर्व की अनुभूति का जागरण होगा। उनमें यह आत्मविश्वास जगेगा कि यदि वे चाहें तो देश में रामराज्य की स्थापना भी कर सकते हैं। इस आत्मविश्वास का उदय ही इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। आखिरकार घोर सशस्त्र संघर्ष, प्रबलतम राजनीतिक विरोध और सनातनपरांगमुख न्याय व्यवस्था के होते हुए भी यदि यह लड़ाई जीती जा सकी है, तो यह आत्मविश्वास क्यों न पैदा हो कि हम चाहें तो आज की इस धर्मविरोधी शासन व्यवस्था को रामराज्य में भी बदल सकते हैं। रामराज्य को स्थापित करने की दिशा में इसे पहला कदम माना जाना चाहिए।
राम के अनुयायियों और श्रद्धालुओं के साथ, ऐसे भी कई हैं जो मानते हैं कि राम काल्पनिक हैं; जो लोग सोचते हैं कि राम मन्दिर एक बहुत बडी अपव्यय है; कि यह राम राज्य का उन्माद हमारे समाज को रसातल में कर्षित करेगा; ऐसा राम राज्य हमारे संविधान के उल्लंघन में है। इन लोगों का मानना है कि प्रस्तुत समय में राम के शासनकाल की नहीं परन्तु मानवीय मौलयों के शासनकाल की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति और विचारधाराओं के बीच मे राम मन्दिर और राम राज्य का निर्माण सम्पूर्ण करना है। इसलिए यह आवश्यक है कि राम के प्रति हमारी श्रद्धा, उत्साह और विश्वास को हमारी परम्पराओं में सौंपी गई बुद्धि और तर्क के साथ सदृढ़ किया जाए। रामजी की वास्तविक समरूपता? जैसा कि सर्वविदित है, राम इक्ष्वाकु के वंश में जन्मित रघु के वंशज दशरथ के पुत्र थे। रामायण द्वारा ऋषि नारद ने स्वयं राम के जीवन और उपलब्धियों को ऋषि वाल्मीकि को पूर्ण रूप से वर्णित किया था। किन्तु यह सब ज्ञात होने के उपरान्त भी, वाल्मीकि जी ने महाकाव्य लिखना प्रारम्भ नहीं किया । वाल्मीकि की रामायण में वर्णित उनका ऐसा पोतारोहण आज के चलन में विचित्र माना जायेगा । उन्होंने कुशा घास को
पूर्वाभिमुख कर अपना आसन बनाया । आचमन करके अपनी सङ्कायों को शुद्ध करते हुए, वह ध्यान मुद्रा में अपने पवित्र आसन पर बैठ योग समाधि में मग्न हो गये। समाधि में उन्होंने राम के वास्तविक रूप, वैभव और गतिविधियों का स्पष्ट अवलोकन किया। रामजी का रूप, स्वरूप का दर्शन योग समाधि में इतना स्पष्ट दिखाई दे रहा था जैसे मानो कि करतलामलक (हथेली में आमला)। हृदय की गुफा में वह सर्वोच्च प्रकाश, जो योगिक अनुभव का सार है, वास्तव में राम के अतिरिक्त और कोई नहीं । राम शब्द का उगम 'रम्' धातु से होता है, जिसका अर्थ है 'आनन्दित करना'; योगी अन्तरंग आनन्द का अनुभव करते हैं और लोग राम के बाहरी रूप से आनन्दित होते हैं। इस प्रकार राम के व्यक्तित्व और गाथा का वर्णन कर पाने के लिए, व्यक्ति का महर्षि वाल्मीकि जैसे उच्च कोटि का तपस्वी और कवि होना अत्यावश्यक है । यही कारण है कि वाल्मीकि रामायण को हमारी परम्पराओं में इतनी उच्च मान्यता प्राप्त है।
तुलसीदास की पौराणिक आशा को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने भी दोहराया था। तब की परिस्थितियों को समझते हुए रामराज्य के अपने मायनों को उन्होने लोगों को नसमझाया था। कहा था, “रामराज्य से मेरा तात्पर्य हिंदू राज से नहीं है। रामराज्य से मेरा तात्पर्य दिव्य राज, द किंगडम ऑफ गॉड से है। मेरे लिए राम और रहीम एक ही देवता हैं। मैं किसी अन्य ईश्वर को नहीं, बल्कि एक सत्य और नीतिपरायणता के ईश्वर को स्वीकार करता हूं। चाहे मेरी कल्पना के राम इस धरती पर कभी रहे हों या नहीं, रामराज्य का प्राचीन आदर्श निस्संदेह सच्चे लोकतंत्र में से एक है। जिसमें सबसे कमजोर नागरिक भी विस्तृत और महंगी प्रक्रिया के बिना शीघ्र न्याय सुनिश्चित कर सकता है।“
रामावतार का रहस्य
यदि राम को वाल्मीकि का योगिक अनुभव माना जाये तो दशरथ के पुत्र राम कौन थे ? क्या वह एक कपोलकल्पित पात्र थे? क्या वह 'काल्पनिक' थे? हमारी परम्पराएं योगिक सत्य और ऐतिहासिक व्यक्तित्व के बीच के इस संबंध को 'अवतार' नाम से वन्दित करती हैं - एक अवतरण। एक अवतार, निहित और अमूर्त की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। उदाहरण के लिए, एक क्रोधित व्यञ्जक किसी अव्यक्त क्रोध की अभिव्यक्ति है। एक स्मित मुखाकृति, अन्तरानन्द का अवतार कहा जा सकता है। क्रोध और वासना, लालच और मोह, हिंसा और छल राक्षसी प्रवृत्ति के अवतार हैं। ऐसी मानुष गुणों के अवतरणों से हम भली भाति परिचित हैं | किन्तु मन की असाधारण या योगिक अवस्थाओं, और शक्तियों का अवतार या सांसारिक अभिव्यक्तियाँ अतीव दुर्लभ हैं। राम और कृष्ण अवतार को सर्वोच्च श्रेणी के ऐसे अवतार माने जा सकते हैं। ऐसे अवतारों में स्वाभाविक रूप से आत्म भाव और योगिक अवस्था की अभिव्यक्ति पूर्ण है। अवतार के समकालीन योगियों और तपस्वियों को जब इन अवतारों का दर्शन होता है, वह उन्हें मुग्धबन्ध और विस्मित कर देता है। उन्होंने जो कुछ भी अपने अंदर देखा, उसके हर पहलू को इस बाहरी व्यक्तित्व में प्रकट किया गया है - रूप, रंग, गति, कक्ष्या, कण्ठ, ध्वनि, गुण; समस्त स्वरूप। इस सब पर आधारित राम को आत्मदेव की मूर्ति का रूप माना जाता है। "रामो विग्रहवान धर्मः"। अन्य नश्वर यद्यपि राम और कृष्ण के अवतार रूपी प्रतीमा को नहीं जान पाये, तदापि उन्हें भी सुखद और तीव्र आनन्दमयी भावना का अनुभव हुआ ।
राम और प्रजा पर प्रभाव
यदि हम किसी के क्रोधित मुख को देखें, तो यह स्वाभाविक है कि हम स्वयं क्रोध से भर जायेंगे। एक हंसमुख व्यक्ति अपने समक्ष प्रसन्न्ता भाव को बडाता है। यह प्रतिबिम्ब के एक सामान्य सिद्धांत को इंगित करता है, जिसमें हर भाव के पीछे अन्तर्निहित स्थितियां दर्शक के हृदय मे भी प्रतिबिंबित होते हैं। यदि किसी को महान अवतार अवलोकन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है, तो उसके रूप को मन में धारण करें और उनकी गतिविधियों का सटीक वर्णन अन्तर्मन में सुनें। ऐसा करने से हम स्वाभाविक रूप से योगिक अवस्था में पहुँच जायेंगे। राम राज्य में वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषियों को यह सौभाग्य निज था। राम अवतार में प्रत्येक आत्मगुण आविर्भूत थे। वह वास्तव में अपने भक्तों को प्रसन्न कर देने वाले अवतार थे। जो उसे देखता है, देखता ही रह जाता, वह पुनः पुनः दर्शनिच्छुक बनकर पुनः लब्ध दर्शन से भी अतृप्त रह जाते थे। वाल्मीकि वर्णित, रामजी के शब्द और ध्वनि मीठी और सहज थी। वह पूर्वभाषी थे | अपनी प्रजा की पीड़ा को देखकर उनका हृदय द्रवित हो जाता था। यद्यपि अधिपति, उनका मन संसारिक सुखों के प्रति वैराग्य से भरा था; इतना कि सिंहासन के सुख को छोड वनगमन मे दुख या क्रोध का अवलेश भी न था । परब्रह्मन के अवतरण का निर्णायक गुण यह है कि इसके व्यक्तित्व का प्रत्येक पहलू हमें सीधा योग की आन्तरिक अवस्थाओं की ओर अग्रसर कराता है। योगी और ऋषि ऐसे अवतार की पहचान कर सकते हैं। इस प्रकार वाल्मीकि ने रामायण के महाकाव्य को अपनी कविता में डालने का उद्यम शुरू किया । ऐसी कविता अपने श्रोताओं के मन में सीता और राम के व्यक्तित्व को पूरी तरह से डाल देती है। दिव्य दम्पति के गुणों का ध्यान करना योग की अव्यक्त प्रक्रिया द्वारा आध्यात्मिक आनंद को पुनः प्राप्त करने का एक साधन है। वास्तव में, यदि इस महाकाव्य - 'रामायण का पारायण' किसी राम परायण ज्ञानी द्वारा किया जाता है, तो प्रतिबद्ध और
अवशोषित श्रोताओं पर उसका प्रभाव योग के फल के समान ही होता है। यह उच्चतम योगिक स्थिति की ओर हमें ले जाता है।
रामराज्य और धर्म की रक्षा
जहाँ सौम्य राम, रावण के सम्मुख कालअग्नि के समान भीकर और भीषण रूप में दिखाई पड़ते हैं। जो दूसरों में दया, क्षमा और सन्तोष जैसे सौम्य और सुन्दर आत्म धर्म प्रबोधित करते हैं वही राम उन धार्मिक शक्तियों के विरोधी असुर शक्तियों को नष्ट करने के लिए दृढ़ भी रहते हैं। जो स्वास्थ्य की इच्छा रखता है, उसे कीटाणुओं पर विजय प्राप्त करनी ही पडती है। जो लोग जन कल्याण निहित पवित्रता, तपस्या और योगानुभव परमानन्द
की नींव पर बनाई गई सभ्यता के विरोधी हैं, उनका समूल नाश होना ही चाहिए। ऋषयाश्रम, गुरुकुल जैसे संस्थान को संरक्षित किया जाना चाहिए जो आत्मधर्म, संयम और पुरुषार्थमय जीवन के आधार हैं। इस प्रकार यह आवश्यक था कि ऋषि, उनकी तपस्या, उनके बलिदान और धर्म के उनके सुरक्षात्मक आदेश की रक्षा की जाए। यही राम और कृष्ण जैसे अवतार का लक्ष्य था। युद्ध में बाहरी शत्रु पर विजय प्राप्त करना अपेक्षाकृत आसान है, परन्तु हमारे हृदय में व्याप्त कुरीतियों से जूझना और हमें अत्मधर्म के पथ पर रखना सामान्यों के लिए असंभव ही है। सीता और राम ने अपने आदर्श आचरण और व्यक्तित्व द्वारा अपनी प्रजा में उच्च आदर्शों का आह्वान किया, जो वास्तव में यथार्थ रामराज्य की नींव थी। रामायण में वर्णित है कि राम के शासनकाल में प्रजा लोभ और अतिरेक से मुक्त थी।